मंगलवार, 31 मार्च 2015

अगर तुम न होतीं (कविता)

लिखते लिखते बस यूँ ही खयाल आया..........
अगर ये लेखनी न होती तो मेरा क्या होता..............????

आजकल सुबह भी इसी से शुरू और रात भी इसी पे ख़त्म होती है
सुबह से शाम बस ये लेखनी ही मेरा पहला प्यार होती है।

ये न होती तो इन दर्दों पर दवा कौन लगाता,
मेरे मन का यूँ आप सब तक कौन पहुँचाता ???

ईश्वर की अनुकम्पा कहूँ इसे या आप सबका आशीष,
आजकल ये मेरी मित्र सी हो गई है एकदम ख़ास और अज़ीज़।

आजकल तो ये रोज शब्द रुपी नए रत्न निकलती है,
कागज़ कलम लेकर बैठूँ मैं और बस खुद ही सब लिख डालती है।

जो आजकल अनुभव कर रही हूँ शायद इसी को सुकून कहते हैं,
न जाने कुछ लोग मनोभाव व्यक्त किये बिना कैसे रहते हैं।

अब कोई दुःख दर्द ज्यादा समय टिकता नहीं ,
कागज़ कलम साथ हो तो आजकल आसपास कोई दिखता नहीं।

कुछ लोग हैं भी यहाँ जो लेखन में अड़ंगा लगाते हैं,
पर लिखती फिर भी जाती हूँ तो मेरे समक्ष ज्यादा नहीं टिक पाते हैं।

कुछ को मेरा ये सुकून बिल्कुल रास नहीं आता है पर,
जले तो जले दुनिया इसमें मेरा क्या जाता है??? :-)))

मेरे लिए तो यूँ लिखना अब जीवन की नई राह है,
आप बस मेरा मार्गदर्शन करें क्योंकि 
अच्छा लिख पाना ही अब मेरी चाह है। 

(स्वरचित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

इस ब्लॉग के अंतर्गत लिखित/प्रकाशित सभी सामग्रियों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। किसी भी लेख/कविता को कहीं और प्रयोग करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। आप लेखक के नाम का प्रयोग किये बिना इसे कहीं भी प्रकाशित नहीं कर सकते। dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google
मेरे द्वारा इस ब्लॉग पर लिखित/प्रकाशित सभी सामग्री मेरी कल्पना पर आधारित है। आसपास के वातावरण और घटनाओं से प्रेरणा लेकर लिखी गई हैं। इनका किसी अन्य से साम्य एक संयोग मात्र ही हो सकता है।
मार्गदर्शन जरूर कीजिये नीचे टिप्पणी में जरूर बताएँ क्या-क्या कमियाँ हैं ?
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मेरे दादाजी (कविता)

मेरे दादाजी रौबीले और खुशमिजाज़ व्यक्तित्व के धनी थे। बागवानी के खूब शौकीन।ऐसा कोई पेड़ पौधा नहीं होगा जिसे उनके हाथों ने न सींचा हो। उनके साथ बीता वक़्त बहुत ही सुन्दर रहा। हम भाई बहनों में मुझ पर उनका विशेष प्रेम रहा। उनके रहते मुझे सुबह जल्दी उठने के लिए कभी अलार्म की जरूरत महसूस नहीं हुई।मुझे किसी भी समय उठना हो बस उन्हें बताने की देर रहती और ठीक उसी वक़्त उनकी आवाज सुबह मेरे कानों तक पहुँच ही जाया करती थी। उनका आवाज रुपी अलार्म कभी गलत नहीं हुआ। उनके साथ की यादें तो बहुत हैं, सभी शामिल न कर कर पाई मगर कुछ बातों के जिक्र के साथ, मेरे मन से निकले ये मोती आज इस कविता रूप में पिरोकर उन्हें सादर नमन के साथ समर्पित कर रही  हूँ । 

भूला बिसरा आज सब याद आ गया,
वो आपके साथ पेड़ से जाम तोड़ने वाला मुझे आज ख्वाब आ गया। 

ख्वाब में आप, मैं सभी थे 
पर वो जाम आम के पेड़ नहीं थे।  
आप घंटों साफ़ करते थे जो मैदान,
उसकी जगह बने थे अब कुछ मकान। 

न केले थे न जाम न आम,
न वो राखी, सुरजना, केरी के फूल 
क्या हम उन्हें पानी देना गए होंगे भूल?

कैसे भूलूँ मैं,
प्यार से आपका बार-बार मुझे आवाज़ लगाना, 
तब तो कभी-कभी चिढ़ ही जाती थी,
पर आज बड़ा याद आरहा है वो ज़माना।
   
आपके पैरों पर चढ़कर जब हम दोनों आपके पैर दबाते थे,
किसका पैर कौनसा है इस बात पे आपस में लड़ जाते थे। 
वो तेजाजी की कथा लगा आप हमें घंटों पास बिठाते थे,
आपकी आँखों में नींद न होती और हम सोने को तरस जाते थे।

वो समाचार लगा के आप झपकी लेते जाते थे, 
हमने चैनल बदला नहीं कि फ़ौरन आप उठ जाते थे।
आपका वो ठीक ३ बजे उठाना आज भी याद आता है,
जब भी पिछला याद करूँ तो मेरा मन भर आता है।
  
खूब लाडली थी आपकी मैं, मुझे हमेशा याद रहेगा ,
आपका वो प्यार दुलार दिल में सदा वैसा ही बना रहेगा। 
आपकी याद से आज ये मन दर्पण उजला हो गया,
आपके साथ बीता हर पल आज पलकों की कोरों को भिगो गया।

भूला बिसरा आज सब याद आ गया,
वो आपके साथ पेड़ से जाम तोड़ने वाला मुझे आज ख्वाब आ गया। 
(स्वरचित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

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इनमें से कुछ पल आपके जीवन में भी आये होंगे तो देर किस बात की प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में दर्ज कर दीजिए।
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रविवार, 29 मार्च 2015

दो शब्द....., गुरु द्रोणाचार्य

गुरु द्रोणाचार्य -वे जिनके ब्लॉग, मैंने ब्लॉग बनाते हुए visit किये और जाना कि ब्लॉग कैसे बनाया जाये,कैसे हिंदी में लिखा जाए और क्या क्या ब्लॉग पर लिखा जा सकता है। आप सभी की जानकारी में न होते हुए भी सबके ब्लॉग से कुछ न कुछ सीख लिया है।इसीलिए आप हुए द्रोणाचार्य और मैं एकलव्य और गुरुदक्षिणा के रूप में ये दो ब्लॉग बनाये हैं। 
http://lekhaniblogdj.blogspot.in/
http://lekhaniblog.blogspot.in/
अब गुरुदक्षिणा आपकी रूचि की है या नहीं, ये तो आप पढ़कर ही बता पाएंगे।अपना अमूल्य समय देकर मार्गदर्शन अवश्य कीजियेगा। अब तक आपसे जो ज्ञान मिला उसके लिए आपको सधन्यवाद और आगे अब आप मुझे प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देंगे। इस आशा में अग्रिम धन्यवाद।



धन्यवाद द्रोणाचार्य प्रतिभा सक्सेना जी 

http://lambikavitayen5.blogspot.in/ 

आपके ब्लॉग लालित्यम का कुछ अंश पढ़ा और अहसास हो गया कि आपकी तरह लिखने के लिए मुझे सात जन्म लेने होंगे। न जाने कब मैं आपकी तरह भावपूर्ण और बांध कर रखने वाले साहित्य की रचना कर पाऊँगी। शायद कईं जन्म लग जाएँ। आपको पढ़ पाना मेरा सौभाग्य है।आपके लेखन में सब कुछ  होता है। विषय का ज्ञान,उसकी गहराई, सुन्दर शब्द रत्न और उनका अत्यंत सुन्दर वर्णन।मनोहरी है आपकी अभिव्यक्ति की शैली। कोख का करार की अंतिम क़िस्त पढ़ने की प्रतीक्षा अब और मुश्किल होती जा रही है। 




धन्यवाद द्रोणाचार्य अर्चना चावजी मेम 

http://archanachaoji.blogspot.in/

आपके ब्लॉग मेरे मन की :मैं का कुछ अंश पढ़ा आपसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाई मैं।  आपकी हर रचना मन को छूती है।  अपने अपनी एक पोस्ट में लिखा है -

समझ नहीं आता मेरे लिखे को अच्छा कैसे कहता होगा कोई ,
क्या मुझसे भी बुरा लिखता होगा कही कोई ....

अगर आप इतना अच्छा लिखकर भी ऐसा सोच सकतीं हैं तो जरा इधर एक बार हमारा लिखा पढ़ने का भी साहस जुटा ही लीजिये।आप जान ही जाएँगी कि दुनिया में सबसे खराब कौन लिखता है। पहली बार आपके ब्लॉग से ही जानने को मिला है कि ब्लॉगिंग के ज़रिये मन की अभिव्यक्ति सिर्फ लिखकर व्यक्त करने का नाम नहीं। पॉडकास्ट,गीत, कवितायेँ इतना सबकुछ कैसे कर लेतीं हैं आप। निःशब्द हूँ मैं। अभिव्यक्ति के सभी माध्यम हैं आपके ब्लॉग पर। सौभाग्यशाली हूँ कि आपका ब्लॉग पढ़ने को मिला।
कठपुतली तो हम सभी हैं उस ईश्वर के हाथ की बस शुक्र है कि उसने अब तक हमारी डोर अपने हाथ से छोड़ी नहीं उस गुड़िया की तरह। 




धन्यवाद द्रोणाचार्य रश्मि प्रभा जी

http://lifeteacheseverything.blogspot.in/


आपके ब्लॉग मेरी भावनायें का का कुछ अंश पढ़ा। आपकी तो रग -रग में साहित्य बसा है साहित्य की महान ज्ञाता हैं आप। आपका लिखा मन को छूता है। आपके ब्लॉग को पढ़ने का असीम सौभाग्य कुछ समय पहले ही मिला है मुझे। आपने निःसंदेह अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने नाम को बखूबी सार्थक कर लिया है। अभी तो कविताओं का बीजारोपण शुरू ही किया है मैंने आपकी प्रतियोगिता में शामिल करने जितनी उत्कृष्ट कविताएँ तो नहीं है मेरी। पर आपके मार्गदर्शन रुपी जल से सिंचाई अगर मेरी लेखनी से रोपित, इन लेखन रुपी बीजों को मिल जाये तो शायद कुछ वक़्त के बाद इस मुकाम तक पहुँच पाऊँ।



धन्यवाद द्रोणाचार्य देवेन्द्र पाण्डेय जी 

http://devendra-bechainaatma.blogspot.in/

आपके ब्लॉग बैचैन आत्मा का कुछ अंश पढ़ा  आपका ब्लॉग जब भी पढ़ती हूँ,अधिकतर रचनाएँ पढ़ते हुए चेहरे पर बरबस ही एक धीमी सी निश्छल मुस्कान बिखर जाती है। मैं भी कभी आपकी तरह लिखकर, किसी के चेहरे पर ऐसी मुस्कान ला पाऊँ, ऐसा करने के लिए मेरे लिए तो सच में अभी बहुत "दूर है मंज़िल"



धन्यवाद द्रोणाचार्य मंटू कुमार जी

http://mannkekonese.blogspot.in/

आपका ब्लॉग मन के कोने से सबसे पहले देखा। आप का ब्लॉग पूरा पढ़
चुकी हूँ। यथार्थ  कहता और लिखता है आपके मन का कोना। बहुत यूनीक भी लिखते हैं आप। बस आपको पढ़ने के लिए काफी इंतज़ार करना पड़ता है। थोड़ा ज्यादा लिखेंगे तो हमें भी आपके साहित्य का रसानंद मिलता रहेगा। आधुनिक ज़माने की बेरंग होली मनाने से अच्छा रास्ता तो वही है मैं भी ऐसी ही होली मनाना पसंद करती हूँ कागज़ पर कलम की पिचकारी से शब्दों और भावनाओं के नित नए रंग बिखेरना। 



धन्यवाद द्रोणाचार्य अनु सिंह चौधरी जी 

http://mainghumantu.blogspot.in/

आपका ब्लॉग मैं घुमन्तु पढ़कर काफी प्रेरणा मिली। मैं तक़रीबन भूल ही चुकी थी लेखन मेरे अंदर का सारा कचरा साफ कर देता है। आपका ब्लॉग पढ़कर याद आ गया और आजकल समय निकाल कर सबसे पहले आपका मॉर्निंग पेज पढ़ती हूँ और फिर खुद के मॉर्निग पेजेस लिखने लगी हूँ। लेकिन वो पर्सनल डायरी तक ही सीमित रखे हैं। साहित्य के आपके जितने  सुंदर मोती बिखेरना जिस दिन सीख जाउंगी उस दिन आपके मॉर्निंग पेजेज की तर्ज पर कुछ नया शुरू करने का साहस जरूर जुटाऊंगी। और हाँ घर के काम मुझे भी बड़े unproductive और उबाऊ लगते हैं। 



आप जैसे ब्लॉग जगत के दिग्गजों के बीच मेरा कोई स्थान तो नहीं है 

बस आप सबका मार्गदर्शन पाने के लिए आप सबसे जुड़ने का असीम

साहस जुटा पाई हूँ। कृपया अपने अमूल्य समय का कुछ अंश देकर 

मेरी रचनाओं के विषय में मेरी आँखों पर बंधी पट्टी को उतारते 

रहिएगा। ताकि सच में कुछ अच्छा और रचनात्मक लिख पाऊँ। 

आपकी शिष्या 
dj 

दो शब्द.....आप सब को धन्यवाद

आप सब को धन्यवाद 

ईश्वर - मुझे मनुष्य जन्म देने के लिए। अन्यथा न ये मस्तिष्क होता, न मन और न विचार। और ये सब न होते तो मेरी लेखनी भी न होती। 


मेरे माता पिता -मुझे जन्म देकर अच्छा शिक्षण अच्छे संस्कार देने,मेरी सुसंस्कृत वातावरण में परवरिश करने, मुझे अपनी स्वतंत्र सोच बनाने और उसे बनाये रखने की प्रेरणा देने,साथ ही उसका समर्थन करने के लिए मैं आजीवन उनकी ऋणी रहूँगी।  


मेरे गुरुजन - विशेषकर आदरणीया श्रीमति सुनीता काले मेम, आदरणीय श्री तिवारी सर, 
श्रीमति ममताअग्रवाल मेम, श्रीमति आशा श्रीवास्तव मेम,श्रीमति रीना मेम और महर्षि वेद व्यास विद्या मंदिर के सभी माननीय गुरुजन। आप सही मायने में मेरे सच्चे गुरु हैं, जिन्होंने समय-समय पर मुझे सही ज्ञान देने के साथ-साथ मेरी प्रतिभा को तराशने,मुझे प्रोत्साहित करने का भी कार्य किया है। 

मेरे सभी मित्र एवं रिश्तेदार - जो ब्लॉग बनाने के पहले भी और अब भी मेरी कृतियाँ मेरे कहने पर झेलते हैं और प्रतिक्रियाएं भी देते रहते हैं। तहेदिल से आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद। 


गुरु द्रोणाचार्य -वे जिनके ब्लॉग, मैंने ब्लॉग बनाते हुए visit किये और जाना कि ब्लॉग कैसे बनाया जाये,कैसे हिंदी में लिखा जाए और क्या क्या ब्लॉग पर लिखा जा सकता है। आप सभी की जानकारी में न होते हुए भी सबके ब्लॉग से कुछ न कुछ सीख लिया है।इसीलिए आप हुए द्रोणाचार्य और मैं एकलव्य और गुरुदक्षिणा के रूप में ये दो ब्लॉग बनाये हैं। 

http://lekhaniblogdj.blogspot.in/
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अब गुरुदक्षिणा आपकी रूचि की है या नहीं, ये तो आप पढ़कर ही बता पाएंगे।अपना अमूल्य समय देकर मार्गदर्शन अवश्य कीजियेगा। अब तक आपसे जो ज्ञान मिला उसके लिए आपको सधन्यवाद और आगे अब आप मुझे प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देंगे। इस आशा में अग्रिम धन्यवाद।
 dj 

दो शब्द.....ब्लॉग जगत के महानुभावों से ,

ब्लॉग जगत के महानुभावों को मेरा सादर नमन,
मैं dj (दिव्या जोशी) अपने ब्लॉग्स  के माध्यम से आपके सन्मुख कुछ रचनाएँ प्रदर्शित कर चुकी हूँ और कुछ लिखने का प्रयास जारी है। ब्लॉग जगत में कदम रखने का अनुभव मेरे लिए एकदम नया है।  पर जब से ब्लॉगिंग शुरू की है, सच मानिये स्वयं को नए जोश,उमंग और स्फूर्ति से भरा महसूस करने लगी हूँ।
साहित्य का कोई विशेष ज्ञान नहीं रखती मैं, मगर कागज़ कलम से नाता बहुत पुराना है। लेखन से आत्मिक जुड़ाव है। लेखन ने  हमेशा मुझे परिपक्व, और परिपक्व बनाने का कार्य किया है। बाल्य काल (कक्षा -7) में पहली कविता लिखी थी। उसके बाद लिखे कुछ लेख और कविताएँ पुरस्कृत भी हुए। विद्यालय में अनेकों बार संचालन लिखने व करने का सौभाग्य मिला। इस बीच कभी किसी के जन्मदिवस ,प्रमोशन इत्यादि पर लिखना जारी रहा। बाद में लेखन छूट सा गया,लेकिन पढ़ना बदस्तूर जारी रहा। परन्तु शादी के पश्चात तो लेखन-वाचन लगभग बंद सा हो गया था। पर्सनल डायरी के अलावा इतने दिनों कुछ भी रचनात्मक लिख नहीं पाई। कारणों का जिक्र यहाँ आवश्यक नहीं।
                                                                   
                             ख़ैर सोशल मीडिया मुझे कभी आकर्षित नहीं कर पाया। मगर इधर कुछ समय से ब्लॉग दनिया को जानने की असीम इच्छा जागृत हुई और मौका भी मिल गया। जानती तो पहले भी थी पर इतना नहीं और विशेषकर जबसे हिंदी ब्लॉगिंग के बारे में जाना, तो इसके मोह में पड़ने से, मैं भी खुद को रोक नहीं पाई। लिखे बिना अब चैन नहीं मिल पाता है । एक जुनून सा उत्पन्न हो गया है। इसिलिए ब्लॉगिंग का दुःसाहस कर पा रही हूँ। 
            
               ईश्वर की कृपा से मेरे अभिभावक भी लेखन का हुनर रखते हैं तो ये हुनर वंशानुगत ही समझिए।ईश्वर की अनुकम्पा से कक्षा 8 तक की शिक्षा जिस विद्यालय में संपन्न हुई वहाँ  हमारी हिंदी शिक्षिका परम आदरणीया श्रीमती सुनीता काले जी (न जाने इस समय वे कहाँ हैं)  हिंदी भाषा की प्रबुद्ध ज्ञाता थीं। मेरी वर्तन शुद्धि का श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्हें आज ह्रदय से नमन करते हुए धन्यवाद देना चाहती हूँ। माध्यमिक शिक्षा ही शिक्षण काल की धुरी, उसकी नींव होती है। बस उन्हीं की कृपा से आपको मेरे लेख,कविताओं आदि में वर्तनी की अशुद्धियाँ न के बराबर देखने को मिलेगी।अगर कहीं मिली भी, तो वो तकनीकि खामी की वजह से हो सकती है और अगर ऐसा कहीं आपको नज़र आए तो मार्गदर्शन अवश्य करें,क्योंकि वर्तन अशुद्धियाँ मेरे बर्दाश्त के बाहर की चीज़ है। साहित्य-संगीत में मेरी असीम रूचि है।  ये दोनों ही मनुष्य को परिपूर्ण बनाते हैं। 
                            
                        इसी साहित्य प्रेम की बदौलत दो ब्लॉग लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ। एक लेखनी मेरी भी और नारी का नारी को नारी के लिए।  जहाँ पहले ब्लॉग में स्वरचित कविता कहानियों से लेकर जो कुछ भी मेरी लेखनी लिखवाती है, उन सब का उल्लेख करूँगी।  वहीँ दूसरे ब्लॉग में नारी से जुड़े विभिन्न पहलुओं, स्वास्थय,सौंदर्य,तीज-त्यौहार की जानकारी के साथ ही, नारी के विभिन्न रूपों पर मेरी स्वरचित कविताओं,कहानियों इत्यादि का समावेश करना चाहूँगी।आप महानुभावों जितना ज्ञान,इतने प्रखर और सुन्दर विचार, इतना विशाल शब्द भण्डार तो नहीं है मेरे पास, पर आपके मार्गदर्शन से दिनों दिन सुधार करूंगी, इसका वादा करती  हूँ।बस अपने क़ीमती वक़्त का किंचित मात्र हिस्सा मुझे देकर मार्गदर्शन ज़रूर कीजियेगा। आपकी ताउम्र आभारी रहूँगी। 
                            
                                           आप सब से वस्तुतः यहाँ अनेक लाभों की मंशा से जुडी हूँ। एक तो, लेखन मेरी आत्मशुद्धि करके मुझे आत्मसंतुष्टि देता है। दूसरा, आप सबके बीच रहकर मुझ मूढ़मति में भी साहित्यिक ज्ञान का संचार हो जाएगा और एक महत्वपूर्ण कारण कि मेरे मस्तिष्क  में विचारों की त्सुनामी आती रहती है। व्यक्त न करूँ तो कहीं इन विचारों में मैं ही न बह जाऊँ, ये भी डर बना रहता है। 
बस आप सभी के मार्गदर्शन से स्वयं का ज्ञानवर्धन कर पाऊँ यही अभिलाषा है और इसके लिए आपका सहयोग अपेक्षित है। 
सधन्यवाद। 
 dj 

गुरुवार, 19 मार्च 2015

माँ ने मुझे सँवारा है।

माँ के लिए जितना लिखो कम ही है।तो आज फिर माँ को याद कर रही हूँ। मेरे साथ इन यादों में आप भी शामिल हो जाइये।
माँ ने मुझे सँवारा है,
माँ का गुलिस्ताँ प्यारा है,
लड़खड़ाते हर कदम पर 
मिला जिसका सहारा है,
माँ ही मेरी वो है, 
जिसने हर पल,
निश्छल प्रेम से मुझे दुलारा है। 

मै रोई तो हँसाया मुझे,
निराश हुई तो प्रोत्साहन दिया,
रूठी तो मनाया  भी, 
मेरे गुस्से पर,
मुझे प्यार से समझाया भी,

जिसने साथ नहीं छोड़ा कभी,
चली मैं कभी इस डगर तो कभी उस गली, 
मेरे साथ चाहे न गई हो वो हर कहीं,
पर उसकी ममता हमेशा मेरे साथ ही रही,

संग संग रही सदा मेरे ,
माँ नहीं एक मित्र जैसे,
जिसने हर पल मुझे सुना, 
अपने जीवन का हर ताना बाना
बस मेरे इर्द गिर्द बुना,

उस माँ ने ही मुझे सँवारा है ,
माँ का गुलिस्ताँ प्यारा है,
लड़खड़ाते हर कदम पर,
मिला जिसका सहारा है,
माँ ही मेरी वो है जिसने हर पल,
निश्छल प्रेम से मुझे दुलारा है। 
(स्वलिखित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

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इसकविता पर आपके विचार आप नीचे टिप्पणी में लिख पाएँगे।तो जरूर लिखें। 
और नारी ब्लॉग पर भी जरूर हो आएं  http://lekhaniblogdj.blogspot.in/ वहां भी एक नई कविता आपकी टिप्पणियों की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही है। 


मेरी माँ.... प्यारी माँ....... मम्मा

आज पढ़िए माँ के लिए लिखी मेरी स्वरचित कविता 


कच्ची मिट्टी थी मैं तो बस,
मुझे आकार तो मेरी माँ ने दिया।
अनगढ़, मूर्ख, अज्ञानी थी मैं,
मुझे ज्ञान से साकार तो मेरी माँ ने किया।

दर्द किसी ने भी दिया हो मुझे,
उन पर आँसू तो माँ ने बहाया।
सीने में दफ़न हर इक दर्द पर,
मलहम तो बस माँ ने लगाया।

अनाज उगाया बेशक किसी और ने,
पर खाना तो मुझे माँ ने खिलाया।
जब सोते थे सब चैन से और में जागती रही,
मुझे थपकी देकर तो सिर्फ माँ ने सुलाया।

साथ छोड़ दिया जब सब ने मेरा,
मेरी और हाथ तो माँ ने बढ़ाया।
गलत कहती रही पूरी दुनिया जब मुझे,
बड़ी शिद्दत से मुझे सही तो माँ ने ठहराया।

डरकर छुपने की जगह जब भी तलाशी मैंने,
मेरे हाथ में तो बस माँ का ही आँचल आया। 
इसीलिए शायद
ईश्वर के आगे आँखे बंद कर जब भी खड़ी हुई मैं,
मेरी नज़रों के सामने तो बस मेरी माँ का ही चेहरा आया। 

मेरी दोनों माँ मम्मी और मम्मा (बड़ी मम्मी ) को दिल से समर्पित
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बुधवार, 18 मार्च 2015

ईश्वर

'मन के मोती' में आज फिर से डायरी से ही कुछ शब्द 
27 feb 2012  
at 3:00pm 
monday

सच  है, भगवान कभी हमारी ज़िंदगी से अपनी अहमियत कम नहीं होने देते हैं।  हम जीवन के हर मुश्किल मोड पर आकर उनसे कहते हैं कि  "बस ये हमारी  सबसे बड़ी और आखिरी wish है।  please भगवान एक बार इसे पूरा कर दीजिए। i promice इसके बाद मैं आपसे कुछ नहीं माँगूंगा /माँगूंगी ।"मगर ये कहते वक़्त  हम शायद ये भूल जाते हैं कि आख़िर वो भगवान हैं। सर्वशक्तिमान हैं। उनके द्वारा तो पहले ही सबकुछ सुनिश्चित किया जा चुका है। कब,किसे ,कहाँ,कैसे ?उनकी पल -पल ज़रूरत हमें होगी, ये वो पहले से जानते हैं और इसीलिए शायद हमसे इस तरह के शब्द बुलवाते हैं। लेकिन जब फिर से हमारे समक्ष वो घड़ी आ जाती  है कि हमे उनसे अगली चीज़ माँगनी  होती है , हमें उस सर्वशक्तिमान की महत्ता याद आती है। 
           अनुभव ही जीवन में सबकुछ है।  अनुभव लेकर सीखी हुई बातें ताउम्र साथ देती हैं। आगे गलतियाँ करने से रोकती हैं और  कुछ भी निश्चित करने से पहले हमें सौ बार सोचने को मजबूर करतीं हैं।

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ईश्वर से तो मिल लिए अब ईश्वर के सुन्दर सृजन नारी को जानने के लिए पढ़ें http://lekhaniblogdj.blogspot.in/

ये लम्हें...ये पल....

'मन के मोती' में आज  फिर मेरी डायरी  का एक पेज 

28  feb 2012 
at 4:00pm 
tuesday 
जीवन में कुछ पल  अविस्मरणीय  और  अति सुन्दर होते हैं। जिन्हें  याद रखने की  ज़रूरत  नहीं पड़ती। वो हमारे स्मृतिपटल पर सदैव विराजमान रहते हैं। बिल्कुल  किसी अच्छी फ़िल्म  की पटकथा  की भांति। 
                       अगर  इन पलों  में, अपने साथ होते हैं , तो  इन पलों की महत्ता  भी बढ़ जाती  है।  खुशियाँ  दुगुनी  हो  जातीं  हैं। जीवन के ख़ूबसूरत होने का  अहसास होता है। और हमसे जुड़े विशेष दिन में , अगर कोई  हमें 'ख़ास' होने का अहसास कराए  तो उन पलों की ख़ूबसूरती में चार -चाँद लग जाते हैं।  जब हमारे अपने हमारे  लिए सोचते हैं , हमें 'विशेष' होने का अनुभव कराते हैं ,हमारी ख़ुशी में खुश होकर शामिल  होते हैं, तो जीवन पूर्ण सा  लगता  है। तब सच  में लगता है कि ये जीवन ईश्वर का खूबसूरत वरदान है और हम इस दुनिया में सबसे भाग्यशाली इंसान। जब कोई बिना लाग -लपेट,बिना दिखावे  के हमें  दिल  से चाहता है, हमारे भले के लिए दिल से सोचता है, तो सच में बहुत ही अच्छी अनुभूति होती है। और क्यूँ न हो,  दुनिया में इससे खूबसूरत तोहफ़ा तो कोई हो ही नहीं सकता कि आपके अपने  कुछ लोग आपको दिल से चाहते हैं और आपकी ख़ुशी के लिए अपनी सोच अलग रख  कर आपका साथ  देते हैं। हर हाल में, हर  समय में....... 
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ये रिश्तों की पहेली

'मन के मोती' में आज  मेरी डायरी  के  पन्नों में से एक.......... 

29 feb 2012  
at 2:00pm 
wednesday 
ये एक अद्भुत  और बहुत ही सुन्दर, सुखद अनुभूति है।  सच में, क्या दुनिया में ऐसा होता है ? लेकिन अनुभव करने के  पश्चात ऐसे किसी प्रश्न की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। हाँ  ये होता है।  दो अलग अलग परिवारों संस्कारों में पले बढ़े लोगों में कईं वैचारिक , सांप्रदायिक ,पारिवारिक  मतभेदों के बावज़ूद , ऐसा लगाव, ऐसा मोह एक दूसरे के प्रति  हो जाना , निश्चित ही आश्चर्यजनक है। परन्तु असंभव नहीं है। उनके बीच रिश्ता कोई भी वो मायने नहीं रखता।  मायने रखती है सिर्फ और सिर्फ मानवीय संवेदनाएँ , आत्मा का जुड़ाव। जहाँ एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव होता है, वहाँ  व्यक्ति के चेहरे के हाव-भाव , उसकी भाव-भंगिमाएँ,उसकी हर एक प्रतिक्रिया,उसके अंदर चल रहे विचारों, बातों और अनुभूतियों से हमें अवगत करा देती हैं। जबकि इन सब में शब्द बिल्कुल नगण्य होते हैं। बिना शब्दों के किसी के मन की बातों  को जान लेना, उसकी भावनाओं को बिना बताए ही समझ लेना और उन भावनाओं में शामिल हो जाना। उसकी ख़ुशी में खुश हो जाना,उसके ग़म में हमें भी आँसु आ जाना।क्या ये किसी चमत्कार से काम नहीं है? गौर से समझा जाए तो  हर रिश्ता हमें क़ुदरत  के चमत्कारों का एहसास करता है,जो बहुत ही ख़ूबसूरत एहसास है। 
                                   कईं बार ये स्थिति अतिविचरणीय हो जाती है।  जब हमसे  रिश्ते में जुड़े उस व्यक्ति की परेशानियाँ, दुःख -तकलीफ़  हमारे लिए असहनीय सी हो जाती है। ग़म  उसे हो लेकिन दर्द हमें होता है। हम चाहते हैं कि उससे जुड़ी हर परेशानी या तो चुटकियों में दूर हो जाए या हमें मिल जाए। रक्त-सम्बन्धियों (खून के रिश्ते ) में तो ये भावनाएँ  स्वाभाविक होती हैं। लेकिन यदि रिश्ता किसी अपरिचित से जुड़ा हो तो ये और भी आश्चर्यजनक लगता है। किसी अनजान से इतना जुड़ाव इतनी हमदर्दी ?              
                कईं बार मन इसके पीछे के कारणों को जानने के लिए उत्सुक हो उठता है।लेकिन सटीक जवाब मिल पाना तो बहुत ही मुश्किल है।  शायद इसका कोई आदर्श जवाब ढूंढा जा  भी  नहीं सकता, क्योंकि शायद  हर व्यक्ति की सोच के अनुसार हमें इसके भिन्न -भिन्न  जवाब मिलेंगे। कोई इसे  क़ुदरत का करिश्मा कहेगा तो किसी के लिए ये सामान्य सी स्वाभाविक घटना हो सकती है। शायद कुछ लोग इसे जीवन की  अनिवार्यता मानें और पता  चला कोई तो इसे केमिकल लोचा  ही कह दे। जवाब अनुभव के आधार पर बदलते रहेंगे। बशर्ते  हम उसे उस गहराई उस शिद्दत से अनुभव करें। 
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बुधवार, 11 मार्च 2015

चले जा रहे हैं...........

आज पढ़ें  मेरी लेखनी से लिखी जीवन पर आधारित एक और कविता 

                       चले जा रहे हैं। 

एक राह मिली है मगर,
न मंज़िल का पता न जाने कैसी है डगर। 
चले जा रहे हैं.…… बस चले जा रहे हैं.……

रोज होती है नई सुबह, रोज नई शाम,
नई कोई ग़लती प्रतिदिन और नया समाधान। 
न जाने किस पल का इन्तज़ार किये जा रहे हैं.……
चले जा रहे हैं.…… बस चले जा रहे हैं.……

रात का पता न दिन का होश है,
कितना भारी कम्बख़्त इस जीवन का बोझ है। 
पर इस बोझ को भी ख़ुशी से ढोये जा रहे हैं.……  
चले जा रहे हैं.…… बस चले जा रहे हैं.……

न तपती धूप का दुःख, न चाँदनी रात का सुख,
न सुरों की झंकार न प्रेम की फ़ुहार। 
बेनाम सी एक ज़िंदगी जिए जा रहे हैं.……
चले जा रहे हैं.…… बस चले जा रहे हैं.……

सीखों का पिटारा है ,हर तरफ सलाहों का नज़ारा है। 
खुश रहकर जीने की नसीहतें सुनकर,
ग़म के घूँट पिए जा रहे हैं.……
चले जा रहे हैं.…… बस चले जा रहे हैं.……
आख़िर चलना  ही तो ज़िंदगी का नाम है, सुख-दुःख, धूप-छाँव,
हँसी-उदासी कुछ भी हो बस चलते रहना....... कभी रुकना नहीं ……
कभी थकना नहीं……। सिर्फ और सिर्फ चलते रहना dj 
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"प्यारा दर्शन"(कविता )

माता पिता का स्नेह/मोह अपने बच्चों से भी अधिक यदि किसी पर होता है तो वो हैं उनके नाती-पोते।कहते भी हैं कि मूल से ब्याज अधिक प्यारा होता है। क्योंकि जब उनके खुद के बच्चे छोटे होते हैं, तब अभिभावक कमाने की आवश्यकता और बच्चे से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों की ऊहापोह में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उनके साथ समय व्यतीत करने के आनंद से न चाहकर भी वंचित रह जाते हैं। इस आनंद की कमी उनके जीवन में तब पूरी होती है, जब वो अपने नाती-नातिन या पोते-पोती को अपने सामने खेलते, बड़े होते ,नित नई शरारतें करते देखते हैं।बताने की आवश्यकता नहीं की उनके लिए वो पल कितने अमूल्य होते हैं।
                           यही स्थिति हमारे यहाँ भी निर्मित हुई जब मेरी बहिन को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।  12/06 /12   ये दिन हम सबके जीवन में एक megical moment की तरह था। specialy मेरे मम्मी पापा के लिए।  जितनी ख़ुशी इस दिन हुई उससे भी ज्यादा तब होती थी जब 'दर्शन ' (प्यार से 'एनी ' ) अपने नाना-नानी के यहाँ आता था। उस वक़्त हमारे घर का जो माहौल होता था, बस वही  इस कविता के माध्यम से बताने का प्रयास किया था,उसके प्रथम जन्मदिवस पर। 

आज मन के मोती के अंतर्गत भावनाओं से ओतप्रोत , नाना-नानी के प्रेम में भीगी हुई वही कविता यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ। 

प्यारा 'दर्शन '

नानी देखें बालकनी से, नाना दौड़ लगाएँ,
कब होंगें 'दर्शन' के दर्शन बस यही सवाल सताए। 
मामा मौसी काम छोड़ दर्शन का ध्यान लगाएँ,
घड़ी का हर इक सेकण्ड अब एक घण्टे सा हो जाए।

नन्हें-नन्हें इन क़दमों से चल के जब वो आए,
देख के इस प्यारे एनी को सबका मन खिल जाए। 
कोई करे न कोई काम घर जमघट-सा बन जाए,
अपनी जगह से हिले न कोई कर्फ़्यू-सा लग जाए। 

इसकी इक मुस्कान में सबके टेंशन यूँ खो जाए,
एनी संग हर पल रहने को सबका मन ललचाए। 
यही दुआ हम सब करते तू ऐसे ही मुस्काए,
लेकिन महीने में एक की जगह ATLEAST दो बार तो आए, 
और हर साल तेरा BIRTHDAY  हम यूँ ही धूमधाम से मनाएँ। 
WITH LOTS OF LOVE 
FROM मौसी
SPECIAL THANKS TO मामा 
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