बुधवार, 1 अप्रैल 2015

क्या मैं भी हुनरमंद हूँ ?

रोज कुछ नया लिखती हूँ,
रोज कुछ नया गढ़ती हूँ,
बस लिख लेती हूँ,
इसलिए ही आजकल खुश दिखती हूँ।

वो उदासी वो निराशा,
अब गायब सी हो गई है,
लेखन से मन में,
राहत सी हो गई है।
लिखना तो बस अब ,
एक आदत सी हो गई  है।

शायद इसीलिए, आजकल,
ये कलम भी साथ देती है,
मेरे मन की तुरंत ही,
कागज़ पे उतार देती है।
और मुझ पर लदा हर बोझ ,
एक पल में ये हर लेती है।

कुछ नया करके
मन ही मन प्रसन्न हूँ।
ये सब कैसे हो रहा है,
सोचकर मै खुद भी दंग हूँ।
ये कागज़ कलम मुझे,
और इन्हें मैं पसंद हूँ।
आजकल लगने लगा है कि,
मैं भी एक हुनरमंद हूँ।
(स्वरचित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

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4 टिप्‍पणियां:

  1. Ye vaham nhi sachmuch me ap un hunarmand vyaktiyo me se ek ho jinki tarif me shabd nhi milte ..kamaal ka likha h.

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  2. THANKU:-))) APKE COMMENTS (ACCHE/BURE KAISE BHI) LAGATAR MILTE RAHEN YAHI APEKSHA HAI.

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  3. Divya ji sachmuch aap bahut hunarmand he.. apki lekhni satat chlti rahe...

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    1. आप जैसे शुभचिंतकों के प्रोत्साहन के बल पर ही चल रही है हमारी लेखनी। यदि ऐसे ही हमे मार्गदर्शन मिलता रहा तो जरूर चलती रहेगी सतत। एक निवेदन है मेरी कमियों की और भी ध्यान दिलाएँ तो बहुत आभारी रहूँगी आपकी

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