रविवार, 26 अप्रैल 2015

इन्हें सलाम

आज चलते चलते एक विज्ञापन पर नज़र पड़ी। विज्ञापन था डांस वर्कशॉप का। पर वर्कशॉप कुछ अनोखी थी। इसकी दो विशेषताएँ एक तो ये निःशुल्क थी और वो भी सभी के लिए नहीं। सिर्फ उन चुनिंदा बच्चों के लिए जो बस्तियों /झुग्गी झोपड़ियों में निवासरत हैं और शासकीय विद्यालयों में शिक्षारत। देखकर ख़ुशी हुई सराहनीय प्रयास लगा। अच्छा लगा जानकर कि कुछ और भी लोग हैं जिनका इस और ध्यान है और वे इनके लिए कुछ करना चाहते हैं। 
वैसे भी देखा जाये तो अधिकांश प्रतिभाएँ आजकल छोटे-छोटे गांव शहर और बस्तियों से ही निकलकर आ रही हैं। अधिकतर टैलेंट हंट्स के विजेता भी छोटे क्षेत्रों से ही आते हैं और  अपनी प्रतिभा सिद्ध करके दिखाते हैं। जरुरत है तो बस सही मार्गदर्शन के जरिये उन प्रतिभाओं को निखारने की। प्रतिभा सभी में छुपी होती है फर्क बस इतना है कि सम्पन्न  परिवारों के बच्चों के लिए तो कई माध्यम हैं जिनसे मार्गदर्शन  लेकर वे अपने मनचाहे मुकाम तक पहुँच जाते हैं। पर कई बच्चे प्रतिभा होते हुए भी धनाभाव के कारण उसे सबके समक्ष नहीं ला पाते। ये बहुत ख़ुशी की बात है कि कुछ लोग हैं जो  अपनी प्रतिभा का सही उपयोग इन गरीब प्रतिभावान बच्चों को निखारने उन्हें आगे बढ़ाने में योगदान देकर कर रहे हैं। इनके जज़्बे को मेरा सलाम। 

20 अप्रैल के दैनिक भास्कर समाचार में भी कुछ इसी तरह की न्यूज़ पढ़ने को मिली थी इंदौर की एक बस्ती गोमा की फेल में रहने वाले 35 वर्षीय राजू सैनी के विषय में जिनके पिता एक रिक्शा चालक हैं राजू की पढ़ने के प्रति लगन देखकर उन्होंने राजू को बीएससी और एमए  करवाया। इस दौरान राजू ने महसूस किया कि उनकी तरह पढ़ने की लगन बस्ती के और भी युवाओं और बच्चों में हैं पर धनाभाव के कारण सभी शिक्षा से विमुख हो परिवार का पालन पोषण करने में लगे हैं। राजू ने इसका हल स्व स्तर पर करने की ठानी। दस लोगों का समूह बनाकर साथ में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटे।अपनी प्रतिभा के बल पर सभी का मार्गदर्शन किया मेहनत रंग लाई और राजू सहित चार लोगों का चयन शासकीय पदों पर अलग अलग विभागों में हुआ। जहाँ राजू सहायक स्टेशन मास्टर बने वहीँ उन्हीं की बस्ती के विजय सोनी जो कि कभी हेल्पर का काम कर परिवार चलाते थे आज एसबीआई मैनेजेर हैं। सिलाई करने वाली सोनू आज टैक्स असिस्टेंट है तो पेपर बांटकर आजीविका चलाने वाले कन्हैया प्रजापति अब टीसी हैं। दिनेश कुमार लात्या कभी दिहाड़ी मजदूर थे आज सूबेदार बन गए। पर ये सिलसिला यहाँ थमा नहीं सभी चारों ने तय किया बाकी छः लोगों की तैयारी भी वे जारी रखवाएँगे। इसे आगे बढ़ाते हुए उन्होंने "चाणक्य" नाम से संगठन बनाया और अन्य बस्तियों के युवाओं को भी शामिल किया आज राजू पदोन्नत होकर देवास में स्टेशन मास्टर हो गए हैं। वे रेलवे की ड्यूटी के साथ बस्ती के बच्चों का भविष्य बनाने की ड्यूटी भी बड़ी कर्मठता से निभा रहे हैं आलम ये है की 10 का समूह आज दस गुना हो चुका है। कईयों का भविष्य सुधर गया है और कई "छोटू" बनने से बच गए। राजू सैनी जी और इनके साथियों को हमारा सलाम। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे ही लोगों कि आवश्यकता है समाज में
    अच्छी प्रस्तुति

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    1. सुस्वागतम रचना जी। आभार। आगे भी मार्गदर्शन अपेक्षित है।

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