शुक्रवार, 8 मई 2015

संभल जाओ धरा वालों

क्यों है आजकल विश्वास का परिणाम विश्वासघात,
हर जगह बिछी हो जैसे शतरंज की कोई बिसात। 


किसी के लिए मायने नहीं रखते क्यूँ किसी के जज़्बात, 
रिश्तों में क्यूँ  मिलती है अब नफरत की सौगात। 


भावनाशून्य इस जग में किससे करें अपेक्षा ,
अपने खुद ही नहीं कर पा रहे अपने रिश्तों की रक्षा। 


मासूमियत निवेदन तो जैसे गुम है ,
भावनाएँ सहनशीलता जैसे कोई स्वप्न है।  


हर एक भावना लगती अब तो सुन्न है,
ये सब देख के मन आज बड़ा ही खिन्न है। 



क्यूँ अपनों को अपनों से बैर है एक नफरत सी हर और है, 
ईर्ष्या छायी घनघोर है बस "स्व" का शोर चहुँओर है। 


ये स्वार्थपरता कहाँ से आ गई इस देश में ,
राम ने शबरी के झूठे बेर खाए थे जहाँ वनवासी के भेस में।  


जिस धरती पर कृष्ण अवतार दो माओं के बाल  थे ,
आज एक माँ को रख नहीं सकते उसके चार लाडले लाल हैं।  


हर अच्छाई का जैसे हो रहा अब अंत है ,
नहीं काम आते प्रवचन न उपदेश न सन्त हैं।  


अनेकता में एकता जो पहचान थी इस धरा की , 
एकता तो अनेकता (जाति -पाँति ) ने जाने कब की हरा दी।  


शायद इसीलिए अब बार बार यूँ होते शिव कुपित हैं,
दिखाते अपना रूप मचाते प्रलय त्वरित हैं। 
 
सब कुछ देखकर भी मानव क्यूँ अनजान है ,
दिखी मुझे कल स्वप्न में शापित हो धरा सुनसान है। 

(स्वरचित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

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नारी का नारी को नारी के लिए  http://lekhaniblogdj.blogspot.in

42 टिप्‍पणियां:

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    1. सब कुछ देखकर भी मानव क्यूँ अनजान है ,
      दिखी मुझे कल स्वप्न में शापित हो धरा सुनसान है।
      ...आज कल जो कुछ हो रहा है वह केवल मानव के अपने कर्मों का ही फल है. अगर वह अब भी नहीं संभला तो शायद उसे अफसोस करने का वक़्त भी नहीं मिले...बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति..

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    2. सत्य है आदरणीय। प्रतिक्रिया हेतु आभार।

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  2. आपकी इस उत्कृष्ठ कृति का उल्लेख सोमवार की आज की चर्चा, "क्यों गूगल+ पृष्ठ पर दिखे एक ही रचना कई बार (अ-३ / १९७२, चर्चामंच)" पर भी किया गया है. सूचनार्थ.
    ~ अनूषा
    http://charchamanch.blogspot.in/2015/05/blog-post.html

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    1. बहुत बहुत आभार अनूषा जी।

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  3. जिस धरती पर कृष्ण अवतार दो माओं के बाल थे ,
    आज एक माँ को रख नहीं सकते उसके चार लाडले लाल हैं।

    बहुत सुन्दर!

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  4. क्यूँ अपनों को अपनों से बैर है एक नफरत सी हर और है,
    ईर्ष्या छायी घनघोर है बस "स्व" का शोर चहुँओर है।
    सुन्दर प्रस्तुति ...

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  5. कहाँ से लातीं हैं आप ऐसे शब्द? बहुत ख़ूबसूरत कविता

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    1. सब आप जैसे महानुभावों से मिलने वाले प्रोत्साहन का परिणाम है अभिषेक जी।
      प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत आभार ।

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  6. सुंदर शब्‍दों से सजी हुई रचना।

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  7. सब कुछ देखकर भी मानव क्यूँ अनजान है ,
    दिखी मुझे कल स्वप्न में शापित हो धरा सुनसान है ..
    दरअसल मानव इतना स्वार्थी हो गया है .. उसकी आँखों के आगे कला चश्मा अपना भला भी नहीं देखने दे रहा है ... कबूतर की तरह आँखें बंद किये है ... कटु यथार्थ लिखा है ...

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    1. जो आपने कहा वह बिलकुल सही और दुःखदायी सत्य है आदरणीय।
      आभार प्रतिक्रिया हेतु।

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  8. बहुत सुंदर एवं भावपूर्ण रचना.
    नई पोस्ट : एक मंदिर ऐसा भी

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  10. यथार्थ चित्रण है जिससे असहमत नहीं हुआ जा सकता ---
    "किसी के लिए मायने नहीं रखते क्यूँ किसी के जज़्बात,
    रिश्तों में क्यूँ मिलती है अब नफरत की सौगात।


    भावनाशून्य इस जग में किससे करें अपेक्षा ,
    अपने खुद ही नहीं कर पा रहे अपने रिश्तों की रक्षा। "

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    1. इस ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है आदरणीय।
      अपनी अनमोल प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु आपका बहुत बहुत आभार।
      आशा है इस रूप में आपका मार्गदर्शन आगे भी प्राप्त होता रहेगा।

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  11. सुंदर, सार्थक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति, बधाई

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  12. उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय

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  13. सुंदर संदेश देती सशक्त रचना.

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  14. भावपूर्ण , सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति, बधाई

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    1. सुस्वागतम एवं आभार सर इसी तरह मार्गदर्शन रहिएगा यही अभिलाषा है।

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  15. सब कुछ देखकर भी मानव क्यूँ अनजान है ,
    दिखी मुझे कल स्वप्न में शापित हो धरा सुनसान है।
    ...आज कल जो कुछ हो रहा ...बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति..

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  16. सार्थक भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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    1. सुस्वागतम एवं आभार सर इसी तरह मार्गदर्शन रहिएगा यही अभिलाषा है।

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  17. सुंदर सटीक सामयिक अभिव्यक्ति।

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    1. सुस्वागतम एवं आभार आदरणीया इसी तरह मार्गदर्शन रहिएगा यही अभिलाषा है।

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  18. उत्तर
    1. सुस्वागतम एवं आभार सर इसी तरह मार्गदर्शन रहिएगा यही अभिलाषा है।

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  19. "क्यों है आजकल विश्वास का परिणाम विश्वासघात,
    हर जगह बिछी हो जैसे शतरंज की कोई बिसात। "

    सुन्दर रचना

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