संदेश

जीवन के रंग मौसम के संग

चित्र
1) जीवन का summer season    गर्मियों की चिलचिलाती धूप सा है जीवन!?  तो क्या...!??  अपनों के "प्रेम" रूपी रेत में ठंडक खोज लेना।     हाँsss...! आँसू छिपाने वाले उस काले चश्में की ज़रूरत बहुत पड़ेगी यहाँ...  हो सके तो ज़िन्दगी के बाज़ार जाकर उसे भी खरीद लेना! ©®divyajoshi 2) 2) पतझड़ ( बदले रंग) मेरे मन की शाख़ से अलग होते ही रंग बदल गया तुम्हारा...!? हम साथ थे तो पतझड़ रास आता न था तुम्हें... और अब...!? पतझड़ में सूख़ कर गिरे पत्ते-से रंग में ही तो समाया है न अक़्स तुम्हारा...! ©®divyajoshi 3)सर्दी  (वफ़ाएँ) सर्द सफ़ेद वादियों में पकड़ा है न ये हाथ, तो रिश्ता भी सफ़ेद ही रखना । 3) सावन ( वो बारिशें) पिछली  बार की बारिश में, कुछ बूंदें आंखों में आई तो दिल मे ही उतर गईं। तबसे वे बूंदे बर्फ़ सी जमी हैं, दिल पर ही। और तबसे बारिशों का मौसम भी वहीं थम गया, वापस गया नहीं। बहुत कोशिश की पर वो मौसम जो इस बर्फ़ को पिघला सके, फ़िर कभी लौट कर आया ही नहीं। ©®divyajoshi 5)बारिश और ख़्वाहिशें बारिशें तो तन मन तरबतर कर ही देती हैं, बारिशों में तो मयूर नाच ही उठ...

"आत्मसम्मान की ख़ुशी"

चित्र
"आत्मसम्मान की ख़ुशी"   "आत्मसम्मान की ख़ुशी" रामप्रसाद जी, हाथ में चाय का कप लिए अख़बार का बेचैनी से इंतजार कर रहे थे। आज अखबार में उनके लाल का फ़ोटो सहित इंटरव्यू जो आने वाला था! हाथ में कप तो था, पर चाय पीने की इच्छा पर, अखबार में, अपने बेटे के इंटरव्यू को पढ़ने की उत्सुकता बहुत भारी थी। उनके शहर का सबसे बड़ा बिज़नेस टाईकून, उनका बेटा, अरविंद! इंतजार करते हुए, वे उसकी यादों में खो गए। कल की ही बात लगती है कितना छोटा सा था! कितना लाड़ला हम दोनों का! शाम होती और रोना शुरू हो जाता। 1 साल का होने तक उसका ये सिलसिला नहीं थमा। रमा और मैं बारी-बारी, आधी-आधी रात ही सो पाते थे। उसको चुप करने के रातभर किए गए सारे प्रयास नाकाम होते। आख़िरकार वह सुबह हमारे जागने के समय पर ही सोता!! सोचकर मन भीग गया उनका। अतीत के गलियारों में कुछ और चक्कर लगा ही रहे थे कि पेपर वाले की गाड़ी का हॉर्न बजा। हड़बड़ी में चाय का कप रख, वे भागे। जैसे पेपर वाला आज उन्हें बिना पेपर दिए ही चले जाने वाला हो!!पेपर लगभग उसके हाथ से छीनते हुए अपनी कुर्सी तक आते-आते, उन्होंने पेपर के पन्ने पलटना भी शुरू कर द...

वो बरसाती रात

चित्र
वो एक काली, तूफ़ानी रात थी। घनघोर घटाएं और तेज़ बरसात थी। बस/टैक्सी के इंतज़ार में अकेली खड़ी मैं, मेरा नाम ROSE, औऱ रोज़ (प्रतिदिन) की तरह कईं आशंकाएँ मन में साथ थीं। अचानक एक तूफ़ान आया जो इस तूफान से कईं गुना ज़्यादा ख़तरनाक था, मैं उसकी ही संपत्ति हूँ, इस पर उसका अटल विश्वास था। एक झटके में आकर चला गया वो, मेरे अस्तित्व को पल में मिटा गया वो, तबसे ROSE के अंदर का सब कुछ ख़त्म हो गया। घर तो पहुँचा ही दिया गया जैसे-तैसे मुझे, पर इस ROSE का तन और मन आज भी वहीं पड़ा, उसी काली, अंधेरी, बरसाती रात में भीग रहा है। मन तो आज भी गीला है अंदर से, क्या कोई धूप जो इसे सुखा सके आपकी नज़र में है!!!!!? हो तो ज़रूर बताना🙏. ©®divyajoshi प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति Rose- लड़की तूफान- विकृत मानसिकता का कोई पुरुष जो उसकी अस्मिता से खेल गया। आज संदर्भ में ज़्यादा कुछ नहीं लिखूंगी। मुझे नहीं लगता कि इसके मर्म को सरल शब्दों में समझाने की ज़रूरत है। वैसे भी ऐसा कुछ लिख लेने के बाद मैं खुद ही काफी देर तक सामान्य नहीं हो पाती हूँ, हथौड़े से बजते रहते हैं दिल दिमाग पर। फिर नहीं लिख पाती। तो अब मेरा लिखना ख़त्म...

हम-तुम

चित्र
  जो भूल गए वो आज याद कर लो, कभी तो तन्हाई में हमसे भी बात कर लो। जब होती थीं बातें हमसे और बस हमसे, गुज़रे उन दिनों को इक बार याद  कर लो। इश्क़ था बेपनाह तब भी और आज भी है आपसे , कभी तो फ़ुर्सत से हमसे भी एक मुलाक़ात कर लो। क्यूँ उलझ गए हो सब में यूँ, इतना, कभी सिर्फ़ मेरे साथ मिलकर फ़िर से उन ख़ुशियों को आबाद कर लो। मैं ढूँढती हूँ, उस शख़्स को रोज़ ही आप में, खिल जाता था मेरी इक मुस्कान से जो कभी, हिल जाता था मेरे चंद आँसुओं से जो कभी, सौंपकर मुझे उस शख़्स को फिर से मुझे खुश करने का  कुसूर आज आप कर लो। मैं कर दूँगी आपकी हर उदासी को दफ़्न, चेहरे पर उसी मुस्कुराहट का बस एक बार आगाज़ तो कर लो। कर दूँगी मैं आपका हर ख्वाब पूरा, मिलकर मग़र अपने ख़्वाबों की फ़ेहरिस्त तो साझा आज कर लो। हज़ार अंधेरों से गुज़रकर आप तक पहहुँचती हूँ, मैं ही हर बार, आज तो वो रास्ते रोशन करने का गुनाह आप कर लो। टूट कर बिखरती रही हूँ जिस राह में, मैं रोज़ ही, कभी आप भी उस राह-ए-मुहब्बतके सफ़र पर साथ चलने की फ़रियाद तो कर लो। झूठा ही सही जताओ मगर, दे सकोगे फिर से वो प्यार, ये वादा आप कर लो। ...

तुम बहुत ख़ूबसूरत हो

चित्र
  हाँ! तुम ख़ूबसूरत हो! अंतस की निर्मलता से विचारों की प्रबलता से चंद्र की शीतलता से तुम ख़ूबसूरत हो सूरज की लालिमा से स्वमयं की गरिमा से क्रोध की रक्तिमा से तुम ख़ूबसूरत हो गगन की शांति से अंदर की क्रांति से समाज की भ्रांति से तुम ख़ूबसूरत हो नदियों के कलकल से मन के शोर और उथल पुथल से इस विश्व सकल से तुम ख़ूबसूरत हो वीणा की तान से अपनो के मान से बचे खुचे स्वाभिमान से तुम खूबसूरत हो बंसरी की धुन से अपने सुंदर मन से अग्रजों को सदैव नमन से तुम ख़ूबसूरत हो इन सबकी वजह से तुम खूबसूरत हो हर तरह से तुम ख़ूबसूरत हो वात्सल्य प्रभा से तुम खूबसूरत हो हमेशा से इतना तुम ध्यान रखो बस इसका मत अभिमान रखो अपने अंतस की खूबसूरती का बस तुम यूँ सम्मान रखो।

जीवन की जंग: असली ख़ुशी

चित्र
  हिम्मत तो ऐसी है हमारी कि हमारा जीवन संघर्ष देखने वाले, ख़ुद थक कर रो दिए। पर हम न रुके। थके हम भी, मगर फ़िर आगे बढ़ गए। रोए तो ख़ूब, मगर ये न हुआ कि आँसुओ की चादर ओढ़ चैन से सो गए। मज़ा तो तब आया जब काँटो के निकलने पर बहे, रक्त को, हर बार, महावर का रंग समझ, हम धो गए। और हमें गिराकर हर बार हँसने वाले, जीवन भर यूँ ही हाथ मलते रह गए। ©®divyajoshi

जीवन की वैतरणी

चित्र
आज उन दोनों को वहाँ के प्रमुख देवदूत ने अपने पास बुलाया था। दोनों आए, उन्होंने देवदूत को प्रणाम किया। देवदूत ने उन्हें बैठने को कहा। आज तुम्हारी यहाँ रहने की अवधि समाप्त। दोनों के चेहरों की उदासी झट से मुस्कान में परिवर्तित हो गई। तो क्या हमें प्रभु के दर्शन मिलेंगे उनकी शरण में स्थान मिलेगा? ज़रुर। लेकिन कुछ और परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लेने के बाद। आख़री जन्म बचा है ये तुम्हारा। प्रभु का संदेश है कि अब तुम्हें जीवन सरिता में भेज दिया जाए। जीवन सरिता……!? हाँ, ये आख़री परीक्षा है और इसमें खरे उतरने पर निश्चित रूप से श्री चरणों मे स्थान पा जाओगे। अपनी आँखें बंद कर प्रभु स्मरण करो। वे स्वयं तुम्हें इस बारे में सब कुछ बताएँगे। आँखें बंद कर ध्यान लगाने पर उन्हें सिर्फ एक तेज दीप पुंज दिखाई दिया। दर्शन नहीं मिले मगर उनकी दिव्य वाणी साफ सुनाई दे रही थी। आज तुम्हें जहाँ भेज रहा हूँ, वह तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ जन्म और मुझसे मिलन का आख़री पड़ाव है। जीवन सरिता, अनंत सुख करणी, प्रबल दुख हरणी, ऐसी है जीवन की वैतरणी, जीवन नदी पार कर मोती ढूँढने हैं तुम्हें और उन्हें जीवन नदी में प्रवाहित कर पुनः...

कूल बर्थडे सेलीब्रेशन

चित्र
  रसोईघर से तो महक ही महक आ रही थी आज। माँ सुबह से ही जुट गई थीं रसोई में। उन्होंने मोहित के पसन्द के कईं सारे पकवान बनाये थे। उसके 19 वसंत जो पूरे हो रहे थे। पूरा घर उन पकवानों की महक से सराबोर हो रहा था जैसे। "मोहित बेटा कुछ तो खा ले अब, सब तेरे लिए ही बनाया है।" माँ ने प्लेट्स टेबल पर जमाते हुए उसे आवाज़ लगाई। "हाँ माँ, जरूर खाऊँगा। पर आप सबके साथ।" "आख़िर आपने इतने प्यार से मेरे लिए सब बनाया है।" "तब तक कुछ टेस्ट तो कर ले।" बस माँ,  दोस्तों को आ जाने दो न, फ़िर सब साथ खाते हैं। मोहित के चार ख़ास दोस्तों, रवि, विकी, साहिल और प्रतीक को आज उसने जन्मदिन की ख़ुशी में अपने घर पर खाने के लिए आमंत्रित किया था। थोड़ी ही देर में हूsssss…वूsssssहूsss...!!! … हैप्पी बर्थडे टू यू……के तेज़ शोर के साथ चारों दौड़ते हुए एकसाथ मोहित के गले लग गए। (गले पड़ गए कहना शायद ज्यादा उचित रहेगा क्योंकि एकसाथ सबके भार के कारण वह गिरते गिरते बचा) सब बेहद ख़ुश थे। मोहित की ख़ुशी का तो ठिकाना नहीं था। हैप्पी बर्थडे यार भाई! पर ये क्या टी शर्ट पहनी यार! इतनी सोबर सी! थोड़ा कू...
चित्र
  शोर से दूर … खुद में मशहूर… दिखे जहाँ, स्वयं में अपना नूर… हो ऐसा नया दस्तूर… चल वहाँ जाते हैं। द्वेष हो न जहाँ… साथ खो न जहाँ… कोई हो न जहाँ… चल वहां जाते हैं। रहें खुदी में मस्त… कुरीतियाँ, जहाँ हो सके ध्वस्त… "मण-भर" खुशी से आश्वस्त… चल वहां जाते हैं। मन तरंगिनियाँ खुल के लहराए… उम्मीद अपना गीत गाए… अपना चित्र आप बनाए… चल वहाँ जाते हैं। ©® दिव्या जोशी

"वजूद"

चित्र
  "वजूद" बस इक महीन सी बूंद में समाया हुआ सूक्ष्म सा अक्स भी नाक़ाबिले बर्दाश्त हो गया तुम्हें...! जो उसे भी नहीं बख़्शा…!?? अपनी तलाश करती स्त्री के वजूद से जोड़कर देखिए... या उस नन्हीं सी कली से जो समाज के वीभत्स मानसिकता वाले किसी वहशी की हवस का शिकार हुई हो... या फिर किसी बेगुनाह acid attack servivor से... दहेज के लोभियों की सताई हुई शारीरिक शोषण की शिकार से... या पुत्र की चाह में अपने वजूद को शून्य होता हुआ देख मानसिक शोषण की शिकार होती स्त्री से... मैं अगर सबका ज़िक्र करने लगी तो शायद कई महीने बीत जाएँ सब पर लिखते लिखते मन द्रवित हो गया है फिलहाल और न लिख पाऊंगी... आप ही बुन लीजिए अपने हिसाब से इस रचना के पीछे का ताना बाना.… ©®Divyajoshi

दोस्ती…?

चित्र
मुझमें तुममें फर्क बड़ा है… फिर कैसे दोस्ती की आस लगाते हो? मैं हूँ "सीरत" की दीवानी, तुम सूरत को पूजने, रोज नए मंदिर चले जाते हो! मुझमें तुममे फर्क बड़ा है… फिर कैसे दोस्ती की आस लगाते हो? मैं हूँ प्रकाश की तलाश करती मशाल सी, तुम तम में तीर चलाने के हरदम ही कयास लगाते हो! मुझमें तुममें फर्क बड़ा है… फिर कैसे दोस्ती की आस लगाते हो? मैं संघर्षरत, अपने हर एक अधिकार के लिए तुम्हें मिला है सब विरासत में, जिसका नित ढोल बजाते हो! मुझमें तुममें फर्क बड़ा है… फिर कैसे दोस्ती की आस लगाते हो? मैं तो ओस की बूंद सी क्षणिक, तुम बरसते सावन से अनन्त तक, यूँ अपनी सत्ता पर इठलाते हो! मुझमें तुममें फर्क बड़ा है… फिर कैसे दोस्ती की आस लगाते हो? मैं बंद किताब के पन्नों सी तुम  घर घर बंटता अखबार, जो नित नए की आस लगाते हो! मुझमें तुममें फर्क बड़ा है… फिर कैसे दोस्ती की आस लगाते हो? मुझे संज्ञा देते हर दम लाचारी की, तुम मन से बीमार होकर भी, खुद को ताकतवर-बलवान बताते हो! मुझमें तुममें फर्क बड़ा है… फिर कैसे दोस्ती की आस लगाते हो? मैं धुन मुरली की, तुम खुद मुरली… सबके अधरों...

तो फिर चाय हो जाए…?

चित्र
  1) कुछ ही लोगों से दोस्ती हमारी पक्की है,  यकीन मानिए उनमे चाय ही सबसे अच्छी है।  [23 जून2021] 2) ख़ुद से रुबरु हुए इक अरसा सा हो गया है, आज फिर चाय के कप की महक और पुरानी डायरी के शब्दों की कसक मेरे साथ है।(प्रतिलिपी की #वनलाइनर प्रतियोगिता के लिए लिखे संकलन में से एक।) [22 जून 2020] 3)  यूँ तो प्यार का कोई कनेक्शन कभी फेल नहीं होता,  मगर… चाय और कॉफ़ी पीने वालों का कभी मेल नहीं होता😊  (मेरी कहानी जीवन सारथि की पात्र राजश्री का मानना है।)  [15 जून 2020] 4) मुझे ये माहौल पसंद नहीं  ये चैं -चैं  पैं-पैं,ये शोरगुल, ये जोर-जोर से चिल्लाना , ये गाड़ी के हॉर्न को, पीं -पीं करके, देर तक जोर से बजाना, मुझे तो पसंद है बस, शांति में, कागज़ कलम लेकर बैठ जाना, सुबह सुबह, उन दो चिड़ियों का, यूँ प्यार से चहचहाना। दिमाग में विचार, और मुँह में चाय की चुस्की लेकर, चंद शब्दों को, कविता की माला में पिरो जाना। [1 अप्रेल 2015] 5) बरसती हों आंखें या हों बरसते बादल थाम लेती हूँ मैं तो बस तुम्हारा आँचल होठों पर मुस्कान हो तब भी तुम्हारी जरूरत बनी रहती ...

सब दर्दों की एक दवा: मेरी प्यारी "चाय"

चित्र
 बरसती हों आंखें या हों बरसते बादल, थाम लेती हूँ मैं तो बस तुम्हारा आँचल होठों पर मुस्कान हो तब भी तुम्हारी जरूरत बनी रहती है न मिले जिस दिन सुकून से तुम्हारा साथ, उस दिन रूठी सी मुझे, मुझसे, मेरी ज़िंदगी लगती है।  कैसे घूँट-घूँट कर तुम मुझमें मिल जाती हो मुझमे घुलते हीअमृतपान सा एहसास कराती हो हर दर्द-ए-ग़म को चुटकियों में हर ले जाती हो कितनी सह्रदय हो न तुम, ये सोचती हूँ मैं… जो तुममें मिलना चाहे… सबको अपना बनाती चली जाती हो। ©®divya joshi

प्रकृति की गोद में…

चित्र
  प्रकृति की गोद में, कभी रहते थे सुकून से, जब टूट जाते थकन से, वो हरी घास प्यार से बुला कर, थपकी दे सुलाया करती थी। कई बार दादी की नर्म गोद सा, एहसास दिलाया करती थी। पंखा झलते थे वृक्ष पितामह जैसे, कुहुकिनियाँ(कोयलें) गीत सुना, माँ की लोरी की सहलाया करती थीं। पापा की मजबूत बाहों ने धरा होता  अम्बिया के वृक्ष का हाथ, उस हिंडोले पर झूल में खूब इतराया करती थी। उड़ती धूल जब आंखों में आती, भाई बहनों की मीठी नोक-झोंक सी सताया करती थी। आंखें मीठी नींद खुद में भरकर,  फिर सपनों की नगरी ले जाया करती थीं। अब तो सूखे तृण हैं नरम घास की जगह  वृक्ष हमने छोड़े नही, कुहूकिनी रूठ कर, जाने किस देस में डेरा डाल बैठी है, धूल और तिनके नोक-झोंक के लिए रस्ता ताकते है और हम मजबूरन बस खिड़कियों से बाहर झांकते है। 22 मई 2021 #AdhureVakyachallenge #nature #naturelove #Naturehurts #responsibility  #pandemichealer

घाट

चित्र
समस्याओं के घाट पर हम अलसुबह बैठ जाते हैं, बुला- बुला कर उन सबके दर्द रोज सुनते जाते हैं। सुन कर दर्द उन सबका फिर अश्कों के खजाने लुटाते हैं, जो है पहले से उनके पास, उन्हें वही दिए चले जाते हैं। जब अश्रु मिलकर "सूने" उन घाटों को भर जाते हैं… ये कैसा समाधान है सोचती हूं मैं क्यूँ आंसू को हम आंसू  और खुशी को खुशी देने को यूँ आतुर हो जाते हैं!? दर्द को राहत और ग़म को खुशी क्यूं दे नहीं पाते हैं…?  जिसके पास जो है उसकी झोली बस उसी से भरते जाते हैं। चलो आज से आंसू को मुस्कान, समस्या को समाधान दे जाते हैं,  समस्याओं के इस घाट पर खुद को ही, एक नया आयाम दे जाते हैं। 21, may, 2021